Saturday, August 10, 2013

नकली हँसी

वो सर्द अस्थिर कदमों की  आहट
आकर रुकी मेरी चौखट पर
आयें हैं फिर ये कदम मेरी चौखट पर
इन सूखी आँखों में नमी बरसाने

धूल से सने शीशों से बहार झाँका
तो धुँधली सी तस्वीर सामने आई
बंद मुट्ठी से शीशे में थोड़ी जगह बनाई
खड़ा था वही चेहरा बुझी सी मुस्कान लिए
चेहरे में कुछ मायूसी और कुछ थकान लिए

जो कभी ऊंची उड़ान भरते थे
उन पंखों में जंग लिए खड़ा वो चेहरा
पंखों ने शायद अब उड़ना छोड़ दिया है
अब तो यादों ने भी साथ छोड़ दिया
नशे में चूर उन खोई  सी आँखों का

बर्फीली रूह की साँसों से
अब सब अकड़ने सा लगा है
मेरे एहसास भी अब जम से गए हैं
आसूं भी कबके थम से गए हैं

नहीं इंतज़ार मुझे अब उस दस्तक का
नहीं इंतज़ार उन अस्थिर बोझिल क़दमों का
जो अब बस कुछ जिंदा यादों तक सिमट गए हैं
अब मेरे  चौखट में भी जगह नहीं रह गयी

देख रही हूँ जाते हुए उन डगमगाते क़दमों को
कुछ  उबल सा रहा है सीने में
कुछ गर्माहट सी महसूस हुई गालों पे
शायद आखिरी बार नम हुई हैं ये आँखें
शायद आखिरी बार आई है अहसासों  की आँधी
शायद आखिरी बार सोचा उस असोच को
शायद आखिरी बार… 

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